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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

यथा स्फुरत्यतिजडमयोऽयस्कान्तसंनिधौ । तथा स्फुरति जीवोऽयं सति सर्वगते परे ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव के प्राण एवं कर्मन्द्रियों से होनेवाले व्यापारो में सन्निधानमात्र से ब्रह्म साधारण कारण है, यों कहते हैं। जिस प्रकार अत्यन्त जड़ लोहा लोह चुम्बक के सान्निध्य से स्फुरित (संचरणशील) होता है, उसी प्रकार सर्वव्यापी सदात्मक इस परब्रह्म के सान्निध्य से यह जीवात्मा प्रस्फुरित होता है