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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verses 23–24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verses 23–24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 23 , 24

संस्कृत श्लोक

यदाङ्गसंविदां वातस्पन्दशक्तिः प्रमोषतः । न करोत्यनुसंधानं कुष्ठी स्पन्दैषणं यथा ॥ २३ ॥ असंवित्स्पन्दतो देहे पद्मपत्रं हृदि स्थितम् । न स्फुरत्यपरामृष्टं दारुपात्रं यथा बहिः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अव देहत्याग का प्रकार बतलाने के लिए भूमिका बोधते है। जिस प्रकार कोढी पुरुष अपने गलित अंगुलि आदि अंगों के स्पन्दन की इच्छा नहीं करता, उसी प्रकार जब प्राण की स्पन्दनशक्ति अंग संवित्तियों का (नखाग्रपर्यन्त लिंगोपाधि द्वारा प्रविष्ट हुए जीवविज्ञानों का) हृदय में लिंगोपसंहार से प्रमोष हो जाने के कारण हाथ, पैर आदि का अनुसन्धान नहीं करती तब देह के हृदय में स्थित भुशुण्डोपाख्यान मेँ वर्णित पद्मपत्र, देह में संवित्तियों का स्पन्दन न होने से प्राण-संचालन के अनुकूल होकर, वैसे कम्पित नहीं होता, जैसे कि लोक में यज्ञ में ऋत्विजं द्वारा अस्पृष्ट काष्ठपात्र कम्पित नहीं होता