Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
हृत्पद्मपत्रस्फुरणात्स्फुटं पुर्यष्टकं भवेत् ।
हृत्पद्मयन्त्रे वहनाद्रुद्धे पुर्यष्टकं क्षयि ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
हृदयरूप पद्म-पत्र के
स्फुरण से यह पुर्यष्टक विस्पष्ट हो जाता है ओर हृदय-कमलरूप यन्त्र जब चलने से रुक जाता है यानी
निश्चल हो जाता है, तब वह भी विनष्ट हो जाता है