Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
देहे पुर्यष्टकं यावदस्ति तावत्स जीवति ।
शान्ते पुर्यष्टके देहो मृत इत्युच्यते द्विज ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे द्विज, जब तक देह में पुर्यष्टक विद्यमान
रहता है, तब तक देह जीवित रहती है (ओर जव) देह में से पुर्यष्टक विलीन हो जाता है, तब देह “मृत
कही जाती हे