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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

प्रविस्मृतस्वभावा हि चिच्चित्तत्वमुपागता । मोहापहतचित्तत्वात्सुमहानिव दीनताम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

मोह से चित्त का तिरोधान हो जाने के कारण अपना स्वरूप भूल गये गाधि, लवण, हरिश्चन्द्र आदि बड़े-बड़े लोगों ने जिस प्रकार दीनता प्राप्त की है, उसी प्रकार अपना विशुद्ध चैतन्यरूप स्वभाव भूल जाने के कारण इस चिति ने चित्तत्व (चित्त के जडता, मलिनता आदि धर्म) प्राप्त किया हे