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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

जडयाऽवशया देहो वातशक्तिसमानया । संचाल्यते तदनया वारीव वीचिमालया ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त के साथ अभेदाध्यास से चिति में जिस प्रकार चित्त के धर्म दैन्य आदि की प्राप्ति हो जाती है, उसी प्रकार प्राण के साथ तादात्म्याध्यास से चिति में प्राणधर्म देह संचालन हेतुता की भी सिद्धि हो जाती है, ऐसा कहते हैं। वातशक्ति (प्राण) के साथ एकता की प्राप्ति होने से प्राण के सदुश पराधीनता को प्राप्त हुई जड़रूप इस चिति के द्वारा यह देह उस प्रकार संचालित होती है, जिस प्रकार तरंग-पंक्ति से पानी संचालित होता है