Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

वस्तुबोधोऽत्र संधत्ते तत्रालं वाग्विकल्पनैः । व्यवच्छेदादि दुश्छेद्यं वचोवाच्यात्किल द्विज ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

हे विप्र, इस संसार में अज्ञानजनित सम्पूर्णं पदार्थो मे परस्पर व्यावृत्तिस्वरूप (परस्पर एक-दूसरे से भिन्नतारूप) जो व्यवच्छेद (पार्थक्य) है, उसे तत्त्वसाक्षात्कार ही एकता में पर्यवसित कर देता है यानी टूटे-फूटे अनेक टुकड़ों को एक में जोड देने की नाई एकता में पहुँचा देता है। (भाव यह है कि तत्त्व का साक्षात्कार हो जाने पर किसी प्रकार का भेद नहीं रहता ।) ऐसे विषय में अनेकविध युक्तियों के उपन्यासो से भी कुछ होता नहीं । कारण यह है कि अज्ञान के निवृत्त न होने पर हजारों युक्तियों से भी अपरोक्ष (प्रत्यक्षात्मक) भ्रम से सिद्ध हुए व्यवच्छेद आदि द्वैत का उन्मूलन अत्यन्त असंभव है