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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

तरङ्गाः सलिले येऽपि तोये शैलस्य ते समाः । शशश्रृङ्गसमः सोऽपि यस्य सत्यः शशाङ्कुरः ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

उस तरह जब जगत एकमात्र विकल्पस्वरूप ही सिद्ध हो चुका, तव उसमें कोई पदार्थ (जल, तरंग आदि) व्यावहारिकरूप, कोई (मरु-मरिचिका, जलतरग आदि) प्रातिभासिकरूप और कोई (वन्ध्यापुत्र, खरगोश के सींग आदि) अत्यन्त असत्स्वरूप ही हैं, यो जो अवान्तर विलक्षणता के विकल्प होते हैं, वे भी अज्ञानी को ही होते हैं, यह कहते हैं। जिस तत्त्वज्ञानी की दृष्टि में खरगोश के सींग से समुत्पन्न धान ओर जौ आदि के अंकुर भी ब्रह्मस्वरूप होने के कारण जब सत्यरूप हैं, तब उसकी दृष्टि में जल में प्रसिद्ध जो तरंग हैं, वे भी पर्वत के मस्तक पर कल्पित जल के तरंग सदृश ही हैं ओर वह पर्वत भी खरगोश के सींग के समान असद्रूप ही है; क्योकि स्वतः असत्त्व और ब्रह्म की सत्ता से सत्ता की कल्पना तीनों मे भी समान है, यह भाव हे