Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
महाविद्योपनयना चिद्भवत्यभिधा सती ।
सा जीवत्वेन बाह्यत्वं तदा द्वीन्द्विव पश्यति ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि विवेक-ज्ञान के लिए अनृत ही जीव-जगद्धाव
पूछ रहे हो, तो सुनो वह चिति जब अविद्यारूपी विचित्र वर्णो (रंगों से) से रंगे गये उपनेत्र पहन लेती है,
तब जीव नाम धारण करती हुई वह बाह्य जीव-जगद्धाव को, दो चन्द्रमा की नाई, देखती है