Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सति द्वित्वे किलैकं स्यात्सत्येकत्वे द्विरूपता ।
कले द्वे अपि चिद्रूपे चिद्रूपत्वात्तदप्यसत् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
नेह नानाऽस्ति किचन” “न तु तदद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद् विभक्तम् "विभुं चिदानन्दम-
रूपमद्भुतम् इत्यादि श्रुतियो से द्वित्व का ही निषेध किया जाता है, एकत्व का नहीं। इसलिये अविरुद्ध
एकत्व का, द्वित्वसमानकक्ष मानकर, कैसे निषेध करते हैं, इस आशय से कहते है ।
सद्ब्रह्म मे द्वित्व के प्रसिद्ध हो जाने पर उसका निषेध करने के लिए एकत्व की कल्पना की जाती है
एवं उसी ब्रह्म मे एकत्व के सिद्ध हो जाने पर वही एकत्व दूसरे एकत्व को लेकर द्वित्व के रूप में कल्पित
होता हे, यों उन दोनों की कल्पना परस्पर सापेक्ष होने के कारण वे दोनों ही तुल्य कक्ष ही हे । वे दोनों
कल्पनाएँ चिद्रूप ही हैं। चिद्रूप होने के कारण वह द्वित्व-कल्पना अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखती ।
एकत्व धर्म भी यदि चैतन्य से अतिरिक्त माना जाय, तो चिदेकरसरवरूपता का व्याघात हो जायेगा ।
अतःदोनों असत्-रूप हैं, यह तात्पर्य है