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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

प्रतिभाससमुत्थानं प्रतिभासपरिक्षयम् । यथा गन्धर्वनगरं तथा संसृतिविभ्रमः ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्या, काम और संकल्प का विनाश होने पर भी यदि जगत का अवभास होता हो, तो वह केवल प्रतिभासरूप ही ठहरा, ऐसी स्थिति में जीवन्मुक्तो के अनुभवों से सिद्ध ष्टि सृष्टि -पक्ष ही अवशिष्ट रह जाता है, इस आशय से कहते है। जिस प्रकार गन्धर्वनगर की उत्पत्ति ओर विनाश एकमात्र प्रतिभास स्वरूप ही है, उरी प्रकार यह संसाररूप विभ्रम की उत्पत्ति ओर विनाश भी एकमात्र प्रतिभासस्वरूप ही हे