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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 48

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

घनप्रवाहयाऽकस्माच्चित्तेहा सैव वर्धते । य एवोच्चैःस्वरस्तन्त्र्याः स एवाक्रामति श्रुतिम् ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

यही स्मृति प्रबल है, इसमें कारण क्या है ? तो मनन, निदिध्यासन के अभ्यासरूप पुरुष प्रयत्न से उसका सुद्दढ़ बना रहना ही कारण है, इस आशय से कहते हैं। चित्त की दो वृत्तियों में जो चित्तवृत्ति अकस्मात उत्तरोत्तर सुदृढ़रूप से होती जाती है, वही दूसरे को उस प्रकार दबाती जाती है, जिस प्रकार वीणा के तार और मन्द दो स्वरों में जो ही ऊँचा स्वर होता है, वही दूसरे को दबाकर कान पर आरूढ़ हो जाता है