Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
एवं ह्यसंभवदिदं त्वविरागभास्यत्तत्सत्त्वमुत्तमपदं परमेकदेवः ।
पूजासु पूजकसुपूजनपूज्यरूपं किंचिन्नकिंचिदिव चित्तपदैकमूर्तिः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षे, उक्त रीति से (तुम अद्वितीय -्रह्मभावमयी ही पूजा करो, दूसरी
बाह्यपूजा नहीं) यह वाह्य पूजा तुम्हारे जैसे ज्ञानियों को योग्य नहीं है, क्योकि बाह्य पूजा तुच्छ फलों में
इच्छा रखनेवाले अज्ञानी जनों के लिए ही प्रकाशमान है यानी उन्हीं के योग्य है । तुम्हारे योग्य उपास्य
तो उत्तमपदस्वरूप परमार्थ सत्तात्मक परब्रह्म ही एकमात्र देव है, उसकी पूजा में पूजक (पूजा द्रव्यों का
स्वामी), सुन्दर षोडशोपचार से पूजन एवं पूज्य (प्रतिमा, लिंग आदि) कुछ भी नहीं है, वह सब उसके
पूजन में तुच्छ पदार्थ-सा है, क्योंकि वह सामग्री मन की एकमात्र कल्पना ही है