Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
कार्यकारणयोरेकसारत्वादेकरूपता ।
फलान्तस्यापि बीजादेर्विकारादिह कल्पना ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
अव उपदेश आदि व्यवहार के लिए व्यवहार-दष्टि ओर परमार्थ-द्ष्टि दोनों का संमिश्रण मानने
पर भी दो तरह की सत्ताओं की कल्पना से परमार्थ सत्-स्वरूप वस्तु में व्यावहारिक सत्तावश से
जीव-जगद्गूप दवेत की स्थिति का स्वीकार करने में विरोध नहीं है, ऐसा कहते हैँ ।
कार्य ओर कारण दोनों में परमार्थतः अनुगत कारण ही एकमात्र तत्त्व है, अतः उन दोनों की एकरूपता
ही रहती है । जैसे बीज आदि के भी, जो फिर फल में पर्यवसित हुए हैं, “वही यह है” इस प्रकार
प्रत्यभिज्ञायमान अनुस्यूत द्रव्य मेँ एकमात्र विकार से ही नानात्व की कल्पना होती है, वैसे ही प्रकृत में
भी नानात्व की कल्पना होती हे