Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अपुनर्भवसौषुप्तपदपाण्डित्यपीवरी ।
परमासाद्य विश्रान्ता विश्रान्ता वितते पदे ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अविनाशी निरतिशयानन्दस्वरूप आत्मप्राप्तिरूपी पाण्डित्य
से स्थूल हुई वह चिति उक्त दशा में परमपद प्राप्तकर समस्त श्रमों से निर्मुक्त होती हुई व्यापक
ब्रह्मपद में विश्राम करती हे । (इससे उसका “महासुप्तपद” नाम भी सूचित हुआ ।)