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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

एतत्ते मनसि क्षीणे प्रथमं कथितं पदम् । द्वितीयं श्रृणु विप्रेन्द्र शक्तेरस्याः सुपावनम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

अब दूसरे स्थान का वर्णन करनेवाले भगवान शंकर वर्णित प्रथम स्थान का उपसंहार करते हैं। हे विप्रेन्द्र, मन के विनष्ट हो जाने पर जो सबसे पहली स्थिति प्राप्त होती है, वह तुमसे कही गई । अब तुम इस चितिशक्ति की परम पवित्र दूसरी स्थिति सुनो