Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
इयमस्मीति संप्राप्तकलङ्का चिन्निबध्यते ।
एतामेव कलां बुद्ध्वा स्वकाभिन्नां विमुच्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी बात का स्पष्टीकरण करते हैं।
मैं दुश्य देहादिस्वरूप हूँ ' इस प्रकार मोह को प्राप्त हुई चिति संसार में फंस जाती है ओर दृश्य के
प्रकाशन में समर्थ इसी चित्कला का, जो अपने से अभिन्नरूप है, अनुभव कर संसार के बन्धन से
निर्मुक्त हो जाती हे