Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
चिदर्थाकारताभावाद्द्वित्वात्सत्त्वं समुज्झति ।
सुखादिमिलितां धत्ते न सत्यां सदिति क्षणात् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्थाकार की भावना से द्वैतभाव प्राप्तकर यह चिति अपनी अखण्ड सत्ता भूल
जाती है ओर देह के सुखदुःख आदि से मिली हुई असत्यरूप ही अपनी स्थिति को क्षणभर में सत्यरूप
है” यों अवधारण कर लेती है (यही इसकी कलंकयुक्त स्थिति हे ।)