Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verses 7–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 7,8

संस्कृत श्लोक

मनसा मनसि च्छिन्ने स्वेन्द्रियावयवात्मनि । सत्यालोकाज्जगज्जाले प्रच्छन्ने विलयं गते ॥ ७ ॥ छिद्यते शीर्णसंसारकलना कल्पनात्मिका । भृष्टबीजोपमा सत्ता जीवस्य इतिनामिका ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए मन का उच्छेद होने पर ही इस जगत का उच्छेद हो जायेगा, यह कहते हैं । महर्षे, मन के द्वारा सत्यभूत ब्रह्मतत्त्व के साक्षात्कार से अपनी चक्षु आदि इन्द्रियों के व्यापारो में हेतुभूत मन के छिन्न-भिन्न हो जाने पर प्रच्छन्न जगतरूपी जाल विलीन हो जाता है और तदनन्तर कल्पनारूप जर्जर इस संसार की कलना नष्ट हो जाती हे । (इस प्रकार तत्त्वज्ञान से कल्पनाओं के साथ मन के विनष्ट हो जाने पर जीवन्मुक्त की पहले जिस भूमिका में स्थिति होती है, उसे लक्षण एवं नामों से दिखलाते हे ।) उस अवस्था में जीव की भूँजे गये बीज की नाई “इति'(%ऋ) नामवाली सत्ता होती हे