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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

पश्यन्ती नाम कलितोत्सृजन्ती चेत्यचर्वणाम् । मनोमोहाभ्रनिर्मुक्ता शरदाकाशकोशवत् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

इस रीति से उस दशा में समस्त दृश्यों का बाध हो जाने के कारण एकमात्र अपरोक्ष दृष्टि के ही बच जाने से उसका दूसरा नाम “पश्यन्ती” भी है, यों कहते है । शरत्काल के आकाशमण्डल की नाई मानसिक मोहरूपी बादलों से निर्मुक्त उक्त अवस्था चित्त के विषयों की चर्वणाका (बार-बार प्रीतिपूर्वक अनुस्मरण का) परित्याग कर रही "पश्यन्ती" नाम से योगियों द्वारा व्यवहृत होती है