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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

दृक्चयो द्योतयामास मुखाकाशतलोदितः । बोधं समुद्गकादर्क अंशुराशिरिवोद्गतः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, जैसे मेघसंपुट से यानी मेघों के बीच से अथवा आकाश और पृथिवी के बीच से उदित हुआ किरणों का समूहस्वरूप सूर्य दिवस को अभिव्यक्त करता है, वैसे ही भगवान्‌ शंकर के निर्मल और त्रिपुण्डरूपी शरत्कालीन अभ्ररेखा से अंकित होने के कारण मुखरूपी आकाशतल में उदित हुए चन्द्र, सूर्य और अग्निरूपी नेत्रों के समूह ने समाधि का व्युत्थान अभिव्यक्त किया