Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततो मुहूर्तेन हरो गौरीकमलिनीसरः ।
मद्विकासोन्मुखः स्वैरं विकासं बहिराददे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सैंधव-खण्ड के घनीभूत होने पर भी उसके रस में द्रवत्व आदि विकार जैसे देखा
जाता है, वैसे ही यहाँ पर भी अवश्य कुछ विकार होगा, इस पर कहते हैं - ˆअविकारादिमत््वाच्च^।
पेंतीसवाँ सर्ग
ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आदि के जो परम पितास्वरूप महादेव हैं,
वे ही परमात्मा पूज्यों की चरम अवधि हैं इसका वर्णन ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, तदनन्तर क्षण भर में गौरीरूप कमलिनी के सरोवरभूत
महादेवजी ने भक्त के ऊपर अत्यन्त वात्सल्यभाव रखने के कारण मुझे ज्ञान देने के लिए उत्सुक
होकर अर्थात् मेरे भाग्योदय से प्रेरित होकर अपनी इच्छा से नेत्रोन्मीलन का स्वीकार किया यानी
उन्होंने अपनी आँखें खोल दीं
सर्ग सन्दर्भ
चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त (&) प्रलयकालीन समुद्र के समान द्वैत के साथ एेक्य का अभाव होने पर भी स्वात्मा में संक्षोभ होगा, इस पर “नहीं” ऐसा कहते हैं - ^असंक्षोभात्^ संक्षोभ क्यों नहीं होगा ? इस पर कहते हैं - “घनचेतनया” ।