Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवानमलदृक्परिणामतोऽस्मिन्
पारे पदे समुपशान्तरवाभिधाने ।
तूष्णीमतिष्ठदमुना मुनिना च सार्धं
विश्रान्तवृत्तिरथ तत्र मुहूर्तमीशः ।। ३१
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : शंकरजी ने पूर्वोक्त प्रकार से उपदेश दिया, तदनन्तर इस वसिष्ठमुनि
के तथा अन्य स्कन्द, नन्दी आदि सभी श्रोताओं के साथ जहाँ पर प्रणव की अर्धमात्रा का चरम भाग
बिलकुल उपशान्त हो जाता है, ऐसे शान्तरवनामक सर्व-संसार के पारभूत तुरीय के तुरीय पद में
भूमानन्दचितिरूपी विमलदृष्टि के साथ एकरसरूप हो जाने से परिणामतः वृत्तियों को विश्रान्त कर
भगवान् शंकरजी उस वसिष्ठजी के आश्रम में क्षणभरतक निश्चेष्ट होकर चुपचाप बैठ गये, क्योकि मन
की परम पद में विश्रान्ति होने पर उसके अधीन सम्पूर्णं इन्द्रियों के व्यापार समाप्त हो गये थे