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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

समस्तं सुशिवं शान्तमतीतं वाग्विलासतः । ओमित्यस्य च तन्मात्रातुर्या सा परमा गतिः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त तुर्यातीतत्व का ही उपपादन कर रहे श्री महादेवजी उपसंहार करते है । सम्पूर्णं संसार शान्त, सुशिव एवं वाणी के व्यापार से अतीत उक्त पदस्वरूप है । विराट्‌ आदिरूप अकार आदि मात्रा-भेद से कल्पित चार पादो से विभक्त हुए ॐ“ इस अक्षर की अर्धमात्रा की जो चार नाद, विन्दु, शक्ति ओर शान्तानामक मात्रा हैं, उनमें जो चौथी शान्तानाम की मात्रा है, वही परमगति है