Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्वरूपं समवाप्नोति रूपालोकमनोदृशाम् ।
आद्यं पूज्यं नमस्कार्यं स्तुत्यमर्घ्यं सुरेश्वरम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षे, इन्हीं सब कारणों से समस्त पूजा आदि व्यवहारो में प्रथमोपस्थित पूजायोग्य,
नमस्कारयोम्य, स्तुतियोग्य, अर््ययोग्य ओर निखिल देवताओं का सवामी वही चितितत्त्व है, यह तुम
जान लो । यही बड़े-बड़े ज्ञातव्य पदार्थो की भी चरम सीमा हे