Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
एनं तं विद्धि वेद्यानां सीमान्तं महतामपि ।
एतमात्मानमालोक्य जराशोकभयापहम् ।
संभृष्टबीजवज्जन्तुर्न भूयः परिरोहति ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वार्द्धक्य, शोक एवं भय के
विनाशक इस आत्मतत्व का साक्षात्कार कर मनुष्य फिर संसार में भूजे गये बीज की नाई अंकुरित
नहीं होता