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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 35, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 35, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

सकलजन्तुषु यत्त्वभयप्रदं विदितमाद्यमुपास्यमयत्नतः । त्वमजमात्मगतं परमं पदं भवसि किं परिमुह्यसि दृष्टिषु ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

हे विप्रेन्द्र, जो विदित हुआ समस्त जन्तुओं में अभय देता है, जो सबकी अपेक्षा आद्य है ओर जो अनायास उपासनायोग्य है, वह अज, परम एवं हस्तगत परमपदस्वरूप तुम्हीं हो, इसलिए बाह्य-दृष्टियों में क्यों मोह करते हो ?