Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 36, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
असत्यं सन्मयं शान्तं सत्यासत्यविवर्जितम् ।
महासत्तादिसत्तान्ते चिन्मात्रं विद्धि नेतरत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उस चितितत्त्व में पृथिवी, अप्, तेजरूप सत् ओर वायु एवं आकाशरूप त्यत् नहीं रहते।
वह सद्रूप, शान्त एवं व्यावहारिक और प्रातिभासिक अवस्थाओं से वर्जित हे । हे भद्र, जगत्सत्यता ओर
अव्याकृतसत्ता के बाध-काल में उसके (बाध के) साक्षीरूप से विद्यमान जो चिन्मात्रस्वरूप वस्तु है,
वह वही चितितत्त्व है, दूसरा नहीं, यह तुम जानो