Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 36, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 36, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
स्वयं भवति रागात्मा रञ्जको रञ्जनं रजः ।
स्वयमाकाशमप्याशु कुड्यं भवति मण्डितम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षे, वही चितितत्त्व स्वयं ही रंजन बीजावस्था
में रागात्मक, विषयस्मृतिकाल में चित्त-क्षोभक होने के कारण रंजकस्वरूप, विषयसम्बन्ध-दशा मेँ
रंजनरूप, विषयवियोग-दशा में चित्त की मलिनता का कारण होने से रजोरूप धूलरूप हो जाता है
और वह स्वयं अमूर्तस्वरूप होते हुए भी शीघ्र ही चित्र आदि से रंजित मूर्तरूप हो जाता है