Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
साक्षिणि स्फार आभासे गृहे दीप इव क्रियाः ।
सत्ये तस्मिन्प्रकाशन्ते जगच्चित्रपरम्पराः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वह चितिसत्ता स्वयं ही उनकी नियामिका क्यों होती है ? इस शंका पर नियमतः उनके प्रकाशन में
हेतु होने के कारण ही नियामिका होती है, यों कहते हैं।
जैसे घर में दीपक के रहने पर समस्त घरभर की क्रियाएँ होती हैं, वैसे ही साक्षीरूपी उस प्रकाशात्मक
अबाधित सत्यस्वरूप अपरिच्छिन्न चितितत्त्व के रहने पर ही जगद्-रूप चित्र की परम्पराएँ प्रकाशित
होती हैं