Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
शिवस्यानन्तरूपस्य सैषा चिन्मात्रतात्मनः ।
एषा हि शक्तिरित्युक्ता तस्माद्भिन्ना मनागपि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
मायिक विकल्पों से जनित कल्पनाओं से होनेवाले चितिभेद ही शक्तिर्या हैं, वे वास्तव मे
परमचैतन्यरूप सदाशिव से किसी तरह भिन्न नहीं हो सकती; अतः विरोध का अवसर ही नहीं है, इस
आशय से इश्वर समाधान करते है ।
ईश्वर ने कहा : अनन्त असीम आकारवाले सदाशिवरूपी आत्मा की जो यह चिन्मात्रूपता है,
वही माया है और यही उसकी शक्ति कही जाती हे । (यह मायाशक्ति स्वरूपतः अनन्त, सदाशिवरूपी
आत्मा को गुण, शक्ति ओर कार्यो से व्यापक बना रही उसकी अनन्तता मानों बढ़ाती ही है, न कि
उसका घात करती हे ।) इसलिए एकमात्र कल्पना से ही वह चिति से तनिकमात्र भिन्न -सी प्रतीत होती
है, वास्तव में कुछ भी भेद नहीं है