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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

पयोदपल्लवालोलनीलाम्बरकृतभ्रमम् । पूर्णं संशुद्धसप्ताब्धिरत्नौघवलयाकुलम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

मेघरूपी बड़े-बड़े किनारों से चंचल नील-आकाशरूपी वस्त्रों से दिन, रात्रि आदि अनेक तरह के वेष- भ्रम उसमें बनाये गये हैं और पूर्ण विशुद्ध सप्त-समुद्ररूप रत्नसमूहों से खचित कंकणों से उक्त नियति- नृत्य सदा ध्वनित होता रहता है