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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

कल्पितानेकब्रह्माण्डकपाटकवितानकम् । लुठल्लोकान्तरव्यूहध्वनन्मुक्ताङ्कपल्लवम् । सुखदुःखदशादोषभावाभावरसान्तरम् ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

उस नृत्य में ब्रह्माण्डों की दीवार ही कपाटक की नाई परदे बनाये गये हैं । असुरो द्वारा व्याकुल किये गये ऊपर-नीचे के लोकों के समूह ही उस नृत्य की नर्तकी के शब्द कर रहे मोतियों से गुँथे हुए परिधानीय वस्त्र के भीतरी कपड़ों के पल्ले हैं | उसमें सुख- दुःख की आविर्भाव आदि दशा ओर उससे होनेवाले दोष ही स्थायिभाव, अनुभव, विभाव, संचारिभाव और श्रृंगार आदि रस के भेद हैं