Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
मग्नोन्मग्नमहानेकताराघर्मकणोत्करम् ।
चन्द्रार्ककुण्डलस्पन्दस्मितस्फुटनभोमुखम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
नियति-नृत्य में उदित ओर अस्तमित महान् चमकीले तारे ही स्वेद-
विन्दुओं का समूह है । वहाँ चन्द्र और सूर्यरूपी कुण्डलो के स्पन्दरूप हलकी मुस्कान से उस नटी का
आकाशरूप मुखमण्डल झलक रहा है