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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

अनारतरणल्लोललोकालंकारकोमलम् । भूरिभूतलपातालनभस्तलपदक्रमम् ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

वह नृत्य निरन्तर शब्द कर रहे चंचल मनुष्य या चतुर्दश भुवनरूपी अलंकारो से अत्यन्त मंजुल लगता है । उसमें (नृत्य मेँ) नियति-नटी के चरण-विन्यास का स्थान यह विस्तीर्णं भूतल, पाताल ओर नभस्तल है