Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
भ्रमच्छशिमणिप्रोतगङ्गामुक्ताफलत्रयम् ।
संदृष्टादृष्टसंध्याभ्रविलोलकरपल्लवम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
घूम रहे चन्द्र और सूर्य से ग्रथित गंगारूपी मुक्तफलों के (मोतियों के)
तीन हारों से युक्त तथा स्पष्ट ओर अस्पष्ट संध्याकालीन अभ्ररूपी चंचल कर पल्लवां से वह समन्वित
है