Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
फेनावर्तविवर्तान्तर्वर्तिनी रसरूपिणी ।
कठिनेन्द्रियसंबन्धे करोति स्पन्दमम्भसाम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
फेन एवं आवर्तरूप विवर्त (रूपान्तर) जिसके भीतर रहते हैं वह रसरूपा ईश्वरशक्ति अथवा फेन
आदि में अनुगत रससामान्यरूपा ईश्वरशक्ति कठिन शिलातल के साथ या जिह्मा इन्द्रिय के साथ
सम्बन्ध होने पर जल का निम्न प्रदेश में उपसर्पणरूप या उदर में उपसर्पणरूप स्पन्दन उत्पन्न करती
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