Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
एषा कुसुमगुच्छेषु रसरूपेण संस्थिता ।
कचति घ्राणरन्ध्रेषु करोति परिफुल्लताम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
पुष्पगुच्छों मे मकरन्दयुक्त गन्धरूप से स्थित हुई यही ईश्वरशक्ति नासिका के पुट मे प्रकाशित
होती है और उन्हें चारों ओर से आमोदित या विकसित कर देती है