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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 37, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 37, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

शिलाङ्गस्था शिलाङ्गाभामसतीं सत्यतापदम् । सर्गाधारदशां धत्ते गिरीन्द्रः स्थितिलीलया ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

मुने, जिस प्रकार विकारशून्य पर्वतराज तृण, वृक्ष, लता आदि कार्यो को धारण करता है, उसी प्रकार यह चित्सत्ता शिला के गर्भ में स्थित होकर शिला प्रतिमा की नाई तत्त्वतः पृथक्‌ सत्ता न होने पर भी व्यावहारिक सत्तावाली "यह कार्य है और यह उसका आश्रय है" यों भेदविकल्पदशा को अविकृत होकर धारण करती है