Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अध ऊर्ध्वं चतुर्दिक्षु विदिक्षु च निरन्तरम् ।
ब्रह्मेन्द्रहरिरुद्रेशप्रमुखामरमण्डितम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वह नीचे-ऊपर, चारों दिशाओं एवं उपदिशाओं में ब्रह्मा, इन्द्र, हरि, हर, आदि प्रमुख
देवस्वामियों से निरन्तर परिवृत है। महर्षे, उस असीम आत्मचैतन्य की यह चतुर्विध भूतों की शोभा एक
तरह की रोम-राजियाँ हैं, यों जानना चाहिए