Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
हृत्कोशकोणविश्रान्तब्रह्माण्डौघपरम्परम् ।
प्रकाशपरमाकाशपारगापारविग्रहम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उसके हृदय-कोश के एक कोने में ब्रह्माण्ड-समूहों की पंक्तियों की पंक्तियाँ
छिपी हुई हैं; वह प्रकाशस्वरूप एवं तम से परे है ओर उसके स्वरूप का कहीं पार भी नहीं पाया जा
सकता