Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
इच्छाद्याः शक्तयस्तस्य चिन्तनीयाः शरीरगाः ।
एष देवः स परमः पूज्य एष सदा सताम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
नियति के नाटक का साक्षीभूत यह चिदात्मा ही वह
परम देव है । यही समस्त पदार्थों का आश्रय, सर्वव्यापक अनुभवात्मक और चैतन्यमात्रस्वरूप हे ।
चिदात्मा ही सज्जन द्वारा सर्वदा पूजनीय है