Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
शिवो हरो हरिर्ब्रह्मा शक्रो वैश्रवणो यमः ।
अनन्तैकपदाधारसत्तामात्रैकविग्रहः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेक विध घट, पट आदि आकृतियों को लेकर असंख्य पदों से बोधित होनेवाली तथा उन आकृतियों
को छोडकर एक पद से (“अस्ति पद से) बोधित होनेवाली सत्तारूप एकमात्र देह से युक्त इस जगज्जाल
का उत्पादक महाकाल इस आत्मदेव का द्वारपाल है यानी अविशुद्ध-दशा में आत्मा के अन्दर प्रवेश
करते समय मन को रोक देनेवाला ओर विशुद्ध-दशा में प्रवेश करते समय अनुकूल रहनेवाला एक तरह
से द्वाररक्षक है