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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verses 18–19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 18 ,19

संस्कृत श्लोक

सहस्रशिरसं शान्तं सहस्रभुजभूषणम् । सर्वत्रेक्षणशक्त्याढ्यं सर्वतो घ्राणशक्तिकम् ॥ १८ ॥ सर्वतः स्पर्शनमयं सर्वतो रसनान्वितम् । सर्वत्र श्रवणाकीर्णं सर्वत्र मननान्वितम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

जो सभी जगह दर्शन- शक्ति से परिपूर्णं हे यानी सर्वत्र देखता है; जो चारों ओर प्राण-शक्ति से समन्वित है; जो सर्वतः स्पर्शन्‌-शक्ति से युक्त है, जो चारो ओर रसना-शक्ति से परिपूर्ण है, जो सर्वत्र मनन से अतीत है और जो सभी ओर सर्वश्रेष्ठ कल्याणस्वरूप है, उस आत्मदेव का चिन्तन करना चाहिए । इस प्रकार विश्वरूप से चिन्तन करने पर भी वास्तव में वह (आत्मदेव) असंग एवं अद्वितीय ही हे, यह भूल नहीं जाना चाहिए यह "सर्वतो मननातीतम्‌" से प्रकृत में कहा गया है