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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

परमास्वादयुक्तेन मुक्तेन कुसुमेहितैः । ध्यानोपहार एवात्मा ध्यानं ह्यस्य समीहितम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

चूँकि, इस आत्मदेव के लिए शुद्धसंवेदनरूप ध्यान ही प्रियतम वस्तु है, अतः ध्यान ही उसके लिए उपहार है । उक्त ध्यान ही उसका अर्घ्य ओर पाद्य है