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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्शुद्धसंविन्मयो भवेत् । ध्यानामृतेन संपूज्य स्वयमात्मानमीश्वरम् ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

उत्कृष्ट आस्वाद से युक्त (७) तथा कुसुम समर्पण आदि बाह्म-चेष्टाओं से निर्मुक्त ध्यानरूप अमृत से ईश्वरस्वरूप अपने इस आत्मदेव की स्वयं ही पूजा करके शुद्ध चैतन्यात्मक हो जाना चाहिए