Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
यदनारतमन्तस्थशुद्धचिन्मात्रवेदनम् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस पूजा के लिए कालविशेष का नियम नहीं है, इसलिए वह सर्वदा ही अनुष्ठान योग्य है, यह
कहते हैं।
देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, खाते, जाते, सोते, श्वास-प्रश्वास लेते, बोलते, मलादि छोड़ते
और इष्ट का ग्रहण करते किसी भी समय पुरुष को शुद्ध संविदात्मक आत्मा के ध्यान में ही तत्पर रहना
चाहिए