Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
एकेनैवाऽमृतेनैष बोधेन स्वेन पूज्यते ।
एतदेव परं ध्यानं पूजैषैव परा स्मृता ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त चिन्तन भी इसी बोध का एक अंग है, अतः यही पूजा सर्वपूजाओं मे प्रधान है, इस आशय
से कहते हैं।
जो यह हृदयप्रदेश में स्थित शुद्ध चैतन्यमात्रस्वरूप आत्मा का अविच्छिन्न संवेदन है, यही सब
ध्यानों में श्रेष्ठ ध्यान है और यही सब पूजाओं में प्रधान पूजा कही गई है