Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
विना तेनेतरेणायमात्मा लभ्यत एव नो ।
ध्यानात्प्रसादमायाति सर्वभोगसुखश्रियः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, यह आत्मदेव ध्यान से ही अपने स्वरूप की अभिव्यक्ति प्राप्त करता है और तदनन्तर वह
मनुष्य से लेकर हिरण्यगर्भ पर्यन्त सभी जीवों के विषयसुख की सम्पत्तियों का उस प्रकार उपभोग
करता है, जिस प्रकार देहाभिमानी अपने घर में उक्त सम्पत्तियों का उपभोग करता है (देहाभिमानी को
भी विषय सम्बन्ध से जनित वृत्ति मे अभिव्यक्त आत्मसुख का ही अनुभव होता है, क्योंकि ब्रह्मात्मसुख
में सभी सुख अन्तर्भूत हो जाते हैं ।)