Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verses 31–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verses 31–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अयमात्मा मुने भुङ्क्ते देहरूपो गृहे यथा ।
ध्यानेनानेन सुमते निमेषांस्तु त्रयोदश ॥ ३१ ॥
मूढोऽपि पूजयित्वेशं गोप्रदानफलं लभेत् ।
पूजयित्वा निमेषाणां शतमेकमिति प्रभुम् ॥ ३२ ॥
अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
पूजयित्वा स्वमात्मानं घटिकार्धमिति प्रभुम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब तत्त्व-साक्षात्कार के अभावकाल में एकमात्र पूर्वोक्त ध्यान से भी उसके उत्कर्षानुसार फल में
उत्कर्ष होता है, यह बतलाते हैं।
हे सुमते, यदि अतत्त्वज्ञ पुरुष भी तेरह निमेष पर्यन्त इस ध्यान से आत्मदेव की पूजा करे, तो वह
(७) यहाँ 'परमास्वादयुक्तेनः यह जो कहा गया है, उसका भाव यह है कि मनुष्य द्वारा भगवान्
को जो फल आदि लौकिक विषयों का समर्पण है, वह साक्षात् अविच्छिन्न सुख का समर्पण नहीं है,
किन्तु परम्परा से कुछ थोड़ा-सा उसका सुख अभिव्यक्त होता है । जैसे मुट्ठीभर धान देने से क्षुधा-
पीड़ित की पूरी तरह से क्षुधा निवृत्त नहीं होती, किन्तु कुछ थोड़ी-सी उसे प्रसन्नता होती है, वैसे
ही उक्त पूजा भी भगवान् को पर्याप्तरूप से प्रसन्न नहीं कर सकती । ओर यह पूजन तो जो कि
प्रत्यगात्मा के स्वयं ही शोधन से उसमें उन निरतिशय आनन्दस्वरूपता का आविर्भाव कर नित्य,
निरतिशय आनन्ददैकरस रूप के साथ परम शिव को उसे समर्पण करनारूप है - परम आस्वादयुक्त
है । अतः वही पूजन उस देव के लिए अनुरूप पूजन कहा गया है, न कि पुष्प आदि ।
एक गो-दान करने का फल प्राप्त करता है